तेल संकट का असर: कंपनियों को पेट्रोल-डीजल पर भारी घाटा, जल्द आम जनता पर बढ़ सकता है बोझ
तेल संकट का असर: कंपनियों को पेट्रोल-डीजल पर भारी घाटा, जल्द आम जनता पर बढ़ सकता है बोझ
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। इसके बावजूद भारत में रिटेल कीमतें नहीं बढ़ने से तेल कंपनियों को भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है। रेटिंग एजेंसी ICRA के मुताबिक कंपनियां पेट्रोल पर करीब ₹14 और डीजल पर ₹18 प्रति लीटर तक घाटे में हैं।
सप्लाई संकट से बढ़ी मुश्किल
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के कारण कच्चे तेल की सप्लाई चेन प्रभावित हुई है। जो कच्चा तेल कुछ समय पहले 70-72 डॉलर प्रति बैरल था, वह अब 120-125 डॉलर के पार पहुंच चुका है। कंपनियां महंगे दाम पर तेल खरीद रही हैं, लेकिन पुराने रेट पर बेचने के कारण उनका मुनाफा लगभग खत्म हो गया है।
होर्मुज रूट पर असर
दुनिया का लगभग 20% तेल और गैस स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरता है। इस रूट पर तनाव बढ़ने से सप्लाई में बाधा आ रही है, जिसका असर वैश्विक बाजार पर साफ दिखाई दे रहा है।
रसोई गैस और खाद पर बढ़ता बोझ
इस संकट का असर आम लोगों की रसोई और खेती तक पहुंच रहा है—
LPG सिलेंडर कंपनियों को लागत से कम दाम पर बेचना पड़ रहा है, जिससे करीब ₹80,000 करोड़ का संभावित घाटा हो सकता है।
यूरिया जैसी खाद की लागत बढ़ने से सरकार की सब्सिडी ₹1.71 लाख करोड़ से बढ़कर ₹2.25 लाख करोड़ तक जा सकती है।
सरल भाषा में, जब किसी उत्पाद की लागत ₹100 हो और उसे ₹80 में बेचना पड़े, तो जो ₹20 का अंतर है, वही ‘अंडर-रिकवरी’ कहलाता है—और फिलहाल यही स्थिति तेल और गैस सेक्टर में देखने को मिल रही है।
CNG और उद्योगों पर भी असर
CNG के मार्जिन पर भी दबाव बढ़ रहा है, क्योंकि कंपनियां पूरी लागत ग्राहकों पर नहीं डाल पा रहीं। ICRA ने केमिकल, प्लास्टिक और खाद सेक्टर के आउटलुक को ‘नेगेटिव’ बताया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक मिडिल ईस्ट में तनाव कम नहीं होता, तब तक तेल की कीमतों में स्थिरता आना मुश्किल है और इसका असर आम आदमी की जेब पर भी पड़ सकता है।
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